वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद

CSIR

प्रौद्योगिकी सीएसआईआर - 800



समुद्री शैवालो की खेती और उसकी गुणवर्धिता, तटवर्ती मछुआरों के जीवन विकास में एक विकल्प



उपयोग :

कप्पाफाइकस कैराजीनान प्रवाही खाद और जेल उत्पादक पालीसेकराइड


प्रौद्योगिकी/उत्पाद का संक्षिप्त एवं विशेष विवरण :

केन्द्रीय नमक व समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान (CSMCRI) पिछले कई दशकों से समुद्री शैवाल, उसकी उपयोगिताओं संबंधित अनुसंधान तथा विकास कार्यो में कार्यरत है। और बहुत से लघु उद्योग संस्थान द्बारा विकसित तकनीकी सहायता का प्रयोग करके अगार अगार और अल्जीनेट का निर्माण कर रहे हैं । प्रवाही शैवाल खाद (LSF), सरगासम नामक समुद्री शैवाल से बनाई जाती है। इसका भी लायसेन्स कई उद्योगों को निर्माण के लिये दिया जा चुका है। भारतीय समुद्री तट से प्रतिवर्ष एलजीनोकाइट (सरगासम एवं टर्बीनेरिया) तकरीबन 15,000 टन सुखा भार, और एग्रोफाइट (ग्रैसिलेरिया एवं जेलीडीएला) तकरीबन 10,000 टन सूखा भार फसल प्राप्त होती है। यद्यपि आज तक प्राकृतिक रूप से उपलब्ध शैवाल पर कार्य किया जाता था, फलस्वरूप प्राप्त अवसर और शैवाल खेती का प्रभाव मर्यादित था ।

कप्पाफाइकस अल्वरेजी एक विश्व व्यापी महत्वपूर्ण उपयोगी शैवाल है जो कप्पा कैराजीनन नामक द्रव्य का एक मात्र स्त्रोत है, और जिसका विभिन्न उद्योगों में उपयोग है। इस समुद्री शैवाल की खेती बृहद पैमाने पर फिलीपाइन्स और इन्डोनेशिया में की जा रही है। हमारे संस्थान ने इसकी खेती भारतीय तट पर 15 वर्ष पहले ही सभी संगरोध नयाचारों के सफल परीक्षण के उपरांत शुरू की है। यह युकोमा कोटोनी के नाम से भी जाना जाता हैं।  प्रारम्भ मे इसको नई परिस्थितियों के अनुकूल बनाने के लिये पहले प्रयोगशाला में फिर सिमित तौर पर पालीथिन थैले का उपयोग करके पहले गुजरात तट पर फिर मण्डपम तट पर (तामिलनाडू) में खेती का प्रयास किया गया (यु.एस. पेटन्ट नंबर 6858430, दिनांकः फरवरी 22, 2005)। तदुपरांत संस्थान ने बृहद पैमाने पर (1 हेक्टर) राफ्ट पद्धति का उपयोग करके खेती की। इस खेती की तकनीक का लाइसेंस मेसर्स पेप्सीको इण्डिया, होल्डिंगस लिमिटेड (पेप्सी) को दिया गया है। अब यह तकनीक मेसर्स एक्वाएग्री प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली और इण्डियन सीवीड इन्डस्ट्रीज, विजयवाडा को स्थानांतरित की जा चुकी है। स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया और तामिलनाडु सरकार वित्तीय सहायता प्रदान करने में मछुआरों की सहायक हैं। विभिन्न प्रांतीय सरकार तटीय निवासियों को वित्तिय सहायता और खेती की तकनीक के मार्गदर्शन तथा प्रशिक्षण द्वारा इस कार्य को बढ़ावा दे रही हैं।

राफ्ट तकनीक :

बांस के टुकड़े जिसकी डायमीटर लगभग 10 से.मी. होती है और 3 मीटर × 3 मीटर के आयताकार रूप में बनाकर का इसका खेती के लिये उपयोग किया जाता है। राफ्ट को अधिक सुरक्षा देने के लिये चारों कोनों पर चार छोटे टूकडे 5 से.मी. डायमीटर के बाधें जाते हैं। राफ्ट में  बीजारोपण 4 मी.मी. रोप पर 2/3 मी.मी. तक मे फसा कर की जाती है। फिर यह रोप राफ्ट में दोनों सिरे पर 15 से. मी. के अंतराल पर बांध दी जाती है।

हर राफ्ट पर 40 कि.ग्रा. फ्रेश मार की सीडीग की जाती हैं। (20 गांढे, 100 ग्रा. ताजा शैवाल, 20 डोरिया) तदुपरांत इसको समुद्र में बड़े पत्थरो से बनाये एकंट में लंबी मोटी नाइलोन की बड़ी रस्सी से बांध दिया जाता हैं ताकि यइ हाईटाइड में भी पानी की तटह पर तैरता रहे बाल, कीचड और दूसरे शैवालों को इस पर जमने और उपजने के लिये राफ्ट की निश्चित अवधि पर सफाई की जाती है ताकि खेती की जा रही समुद्री शैवाल की उपज समुचित रहे।

मूल्य संवर्धन /उत्पाद :

मूल्य संवर्धन संबंधित अनुसंधान एवं विकास की गतिविधियों में संस्थान  निरंतर कार्यरत है। इन गतिविधियों में एक महत्वपूर्ण आविष्कार था, समुद्री शैवाल से एक के बजाय दो उत्पादों के पैदावार की प्रक्रिया। एक सरल प्रयोग जिसमें ताजा समुद्री शैवाल को बिना किसी भी पानी को मात्रा को मिलाये, केवल यांत्रिक कटाई से तरलीकृत किया गया।  इन दो उत्पादों की प्रक्रिया की उत्पति हुई। तरलीकृत समुद्री शैवाल को पेड़पौधों के लिये पोषक पदार्थ की तरह उपयोग में लाया जा सकता है। यह तथ्य प्रारंभिक प्रयोगों से भी पता चला है। इसके बाद यह महसूस किया गया कि यदि इस प्रवाही पदार्थ को छाना जाये तो छलनी से छना हुआ प्रवाही पदार्थ पेड़पौधों के लिये पोषक पदार्थ के रूप मे काम आ सकता है। तथा छलनी में बचा हुआ बाकी भाग कैराजिनन बनाने के काम आ सकता है। इस विचार की नवीनता अमेरिकी पेटन्ट (यु एस पेटंट नं  6,893,479, मई 17, 2005) के मिलने से जानी गयी। बहुत सी प्रमुख एजेंसियो ने आलू (26%), गन्ना  (30-40%), धान (15-30%)  आदि की पैदावार में इस प्रवाही पदार्थ के उपयोग से वृध्धि होने की पुष्टी की है। एक्वा एग्री कंपनी ने संस्थान से कैराजिनन बनाने की तकनीकी जानकारी हांसिल की। यह कंपनी अब बड़े पैमाने पर इस शैवाल की खेती तथा उसकी प्रक्रियाओं मे अग्रणी बनी है।

इसके उपरांत, संस्थान मे और एक महत्वपूर्ण आविष्कार किया गया, कप्पाफाइकस अल्वरेजी  समुद्री शैवाल से जैव निम्नीकरणीय फिल्मे एवं अप्राणिज स्त्रोत से जिलेटीन कैप्सूल का विकास (यु एस पेटंट नं 7067568, जून 27, 2006) अभी इन कैप्सूलों की प्रभावकारिता का मूल्यांकन एक फार्मास्युटिकल कंपनी के साथ किया जा रहा है।
संस्थान का और एक महत्वपूर्ण आविष्कार था सोडियम की कम मात्रा होने वाला वनस्पतिजन्य नमक (यु एस पेटंट नं 7,208,189 24 अप्रैल 2007)। इस आविष्कार को व्यापारीकरन किया गया है।
संस्थान ने ताज़े कप्पाफाइकस अल्वरेजी समुद्री शैवाल से स्वास्थ्य पैय बनाने का भी अमरीकी पेटंट प्राप्त किया है। संस्थान ने प्रदर्शित किया है के शैवाल गुजरात के समुद्रीतट पर भी अच्छी तरह से उगाई जा सकती है। संस्थान इस तरह के अन्य स्थानों का पता करने में कार्यरत है।

प्रौद्योगिकी की मुख्य विशेषताएं :

इसकी खेती के लिए किसी भी प्रकार के कीटनाशकों और रसायनों की जरूरत नहीं हैं।
कप्पाफाइकस अल्वरेजी भारतीय कृषि के लिये वरदान है। यह अन्य फसलों की तरह जमीन उपलब्धि के लिये प्रतिस्पर्धा नहीं करता। इसे उर्वरक (खाद), विकास हार्मोन, कीटनाशकों, कीडनाशकों इत्यादि की आवश्यकता नहीं है। कप्पाफाइकस के sap (प्रवाही पदार्थ) को जिन फसलों पर छिडका गया उन्हों ने अन्य फसलों की अपेक्षा विशेष कीट प्रतिरोधकता दिखाई।
नवीनतम अन्वेषण जो अन्य से विशिष्ट है ।

  1. ताजा समुद्री शैवाल से sap (प्रवाही पदार्थ) तथा कैराजिनन को एकसाथ निकालना।
  2. sap (प्रवाही पदार्थ) कृषि उत्पादों को बढानेवाले एक महत्वपूर्ण पोषक तत्व के रूप में साबित हुआ है।

बुनियादी ढांचे एवम्‌ कार्मिकों की आवश्यकता:

राफ्ट और प्रति हेक्टेयर चार व्यक्ति  (167 राफ्ट)  
प्रौद्योगिकी की वर्तमान स्थिति : व्यापारीकृत

न्यूनतम किफायती यूनिट का आकार, माप एवं कीमत :


40 राफ्ट और 2 व्यक्तियों के लिये रु 26,000/-

कुल लागत :

लगभग रु 1,0855 लाख प्रति हेक्टर

प्रौद्योगिकी हस्तांतरण प्रक्रिया :

CSIR/CSMCRI के नियमानुसार

उत्पाद की स्वीकार्यता :

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किए जाते हैं ।

विक्रेयता :

जिन ग्राहकों ने प्रौद्योगिकी ली हैं उन्हों ने देश में बाज़ार श्रुंखला विकसित की हैं तथा अंतिम उत्पाद को निर्यात भी कर रहे हैं ।
क्या इस प्रौद्योगिकी के लिये विशेष स्थल की आवश्यकता है ? यदि हाँ तो विवरण दीजिए।     
      नहीं


लाभार्थी :

उद्योग, तटीय स्थल के निवासी, स्टेक होल्डर्स और शोधकर्ता

अन्य महत्वपूर्ण जानकारी :

वर्तमान में तमिलनाडु में 900 परिवार समुद्री शैवाल की खेती कर रहे है। प्रत्येक कृषक प्रतिमास औसतन Rs. 8000/ अर्जित कर रहा है। 900 परिवारो में से संस्थान की मदद से सीएसआईआर ग्रामीण प्रौद्योगिकी कार्यक्रम अंतर्गत 120 परिवार समुद्री शैवाल की खेती कर रहे हैं।

संपर्क :

      निदेशक
      सीएसएमसीआरआई, जी बी मार्ग, भावनगर  364021 (गुजरात) ।