
यह विभाग इस संस्थान का उद्गम विभाग है। इस विभाग की संशोधन गतिविधियाँ, समुद्र, भूमिगत और सरोवर के ब्राइन में से उत्पादित नमक की उपज़ तथा गुणवत्ता में सुधार एवं बिटर्न के तलछटीय प्रवाह द्बारा पोटाश, मेग्नेशिया जैसे मूल्यवान समुद्री रसायनों की प्राप्ति हेतु प्रक्रियाओं का विकास करने पर केन्द्रीत हैं।
1982 में इस विभाग की शुरुआत हुइ, और O2, N2 तथा CO जैसे गैसीय अणुओं का उपयोग करके, पर्यावरणीय तथा औद्योगिकीय रुप से महत्वपूर्ण प्रतिक्रियाओं के लिये सहसंयोजक (कोर्डीनेशन) धातु संयोजको को समांग उत्प्रेरक के रुप में उपयोग करने की संभावनाओं का प्रयास किया गया। 1982 से 1991 के दौरान, आण्विक स्तर पर ओक्सीडेशन, इपोक्सीडेशन तथा जल अपघटन (हाइड्रोफोरमीलेशन) जैसी प्रतिक्रियाओं के लिये धातु संयोजकों के संश्लेषण में इस विभाग का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इन सब संशोधन कार्यो पर केटालिसिस तथा इनओरगेनीक मेटल कोम्पलेक्सीस के जरनलो में सैंकडो लेख तथा कुछ पेटन्ट प्रकाशित हुए हैं जिसने अंतरर्राष्ट्रीय स्तर पर विभाग की अलग पहचान कराई है।...
मानव अस्तित्व के लिये जल अत्यंत महत्वपूर्ण स्त्रोंतों में से एक हैं चाहे वह मानव उपयोग खेती या उद्योगों के लिये हो। वर्तमान सदी में उपलब्ध स्थायी जल स्त्रोतों में हुई कमी के कारण पीने योग्य पानी की प्राप्ति सुनिश्चित करना बहुत बडी चुनौती है। देश के कई भागों में प्राप्त पानी उच्च क्षारीयतायुक्त अथवा नुकशानकारक संक्रामकोयुक्त है। इस चुनौती का निवारण करने के लिये नमकीन जल तथा समुद्रीजल का अपक्षारीकरण (विलवणीकरण) तथा जल शुद्धिकरण मुख्य आवश्यकता हैं।
पीने योग्य पानी के उत्पादन हेतु प्रतिवर्ती रसाकर्षण (आरओ) सूक्ष्मनिस्यंदन (एनएफ) तथा अतिसूक्ष्म निस्यंदन (युएफ) जैसी मेम्ब्रेन विलगन प्रक्रियाओं का एक प्रभावी निराकरण के रुप में आर्विभाव हुआ है। CSMCRI ने नमकीन जल तथा समुद्री जल के अपक्षारीकरण तथा अशुद्धिकरण अर्थात् पानी में स्थित पेथागोन्स, सख्ताई, आर्सेनिक, फ्लोराइड जैसे नुकशानकारक संक्रामकों को दूर करने में मेम्ब्रेन अनुसंधान तथा विकास कार्य के लिये देश में अग्रणी स्थान प्राप्त किया है।
यह विभाग अलवणीय तथा लवणीय बंजर भूमि के विकास के उद्देश्य से अपारंपरिक, तैलयुक्त, किफायती, मरुस्थलीय पौधे (जोजोबा तथा जेट्रोफा) और लवणमृदा अनुकूल पौधे (सेलीकोर्निया, सेल्वाडोरा) के चयन, उन्नयन तथा कृषि प्रौद्योगिकी के विकास में प्रवृत्त है। इस कार्य में उक्त प्रजातियों का चयन, प्रजनन तथा किफायती और टिकाऊ उत्पादन के लिये जैवप्रौद्योगिकी अभिगम द्बारा उन्नयन शामिल है।