वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद

CSIR

सीएसएमसीआरआई की व्युत्पत्ति

करीब 3500 मील का लंबा समुद्रतट, राजस्थान तथा कच्छ के छोटे रण के अंतर्देशिय स्रोतों और मंडी में पत्थर नमक की खान के साथ, भारत नमक उत्पादन देश के रुप में विश्व में उच्च स्थान प्राप्त करने की संभावना रखता है। नमक भोजन का एक अनिवार्य अंग होने के अलावा नमक, सोडा एश, कोस्टीक सोडा तथा क्लोरीन जैसे भारी रसायनों के लिये महत्वपूर्ण कच्चा माल भी है।तदुपरांत मांस पैकिंग, मछली संसाधन, डेरी उत्पाद तथा फलों, सब्जियों की डिब्बाबंदी जैसी खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में नमक का उपयोग किया जाता है।

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नमक की मांग के सामने पर्याप्त उत्पादन न होने पर भारत में लंबे समय तक नमक आयात किया जाता था। विभाजन के बाद पंजाब के विशाल सॉल्ट रोक्स तथा सिंध के समुद्री सॉल्ट वर्कस पाकिस्तान में चले जाने से परिस्थिति ओर भी खराब हुई। 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश के विभिन्न भागो में खाद्य नमक का तीव्र अभाव महसूस किया गया। नमक की अपर्याप्तता से उबरने के उपायो की जाँच एवं रिपोर्ट करने के लिये सरकार ने श्री एच एम पटेल की अध्यक्षता में एक आंतर्विभागीय समिति गठित की जो उस समय केबिनेट सचिव थे। समिति ने सरकार को कई अल्पकालिक प्रस्ताव प्रस्तुत किये और नमक के उत्पादन, गुणवत्ता तथा उपयोग संबंधी समस्याओं के बारे में, अन्वेषण हेतु नमक विशेषज्ञ की समिति की नियुक्त करने के लिये परामर्श दिया। नमक के लिए अनुसंधान की आवश्यकता को वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद्‌ (सीएसआइआर), नई दिल्ली ने महसूस किया और 1940 में डॉ एस एस भटृनागर द्बारा नमक के उत्पादन तथा उसकी उपयोगिता पर अनुसंधान कार्यक्रम करने के लिये एक समिति गठित की गई। यह समिति बाद में भारी रसायन समिति के साथ मिल गई और जुलाई 1948 में डॉ माताप्रसाद की अध्यक्षता में पुनः शुरु की गई।
भारत सरकार को भारतीय नमक उद्योगों की नींव रखने के लिये आवश्यक उपायों संबंधी सलाह देने के लिये अप्रैल 1948 में भारत सरकार ने पी ए नारीयेलवाला की अध्यक्षता में एक नमक विशेषज्ञ समिति का गठन किया। भारत में कई सॉल्ट वर्कस की जाँच करने के बाद समिति ने निष्कर्ष दिया कि यदि नमक की गुणवत्ता में सुधार करना हो और सॉल्ट वर्कस को आर्थिक रुप से किफायती तथा कुशलता से चलाना है तो यह अत्यावश्यक होगा कि
(1)    अन्वेषण पर अधिक ध्यान देना
(2)   लघु और बडे पैमाने पर निर्माण के लिए प्रदर्शन ईकाई के रुप में कार्य करने के लिये मुख्य नमक उत्पादन केन्द्रों पर मॉडल कारखानों का निर्माण करना।
(3) नमक उत्पादन की गुणवत्ता तथा उपज़ में सुधार तथा उपउत्पादों की प्राप्ति हेतु अनुसंधान केन्द्रों की स्थापना करना।
सितम्बर 1951 में निर्माण, उत्पादन तथा आपूर्ति मंत्रालय के तत्‌कालीन सचिव श्री सी सी देसाई ने, सीएसआइआर के तत्वाधान में समुद्री नमक पर अनुसंधान कार्य करने तथा अंतर्देशीय झीलों तथा भूमिगत ब्राइन से नमक उत्पादन के लिये एक केन्द्रीय नमक अनुसंधान की स्थापना करने का प्रस्ताव रखा और यह सुझाव दिया कि ऐसा संस्थान सौराष्ट्र के कुछ केन्द्र पर स्थित होना चाहिए और निर्माण, उत्पादन और आपूर्ति मंत्रालय नमक विकास उपस्कर से संस्थान निर्माण हेतु किसी भी प्रस्ताव का समर्थन करेगा।

इसी दौरान सौराष्ट्र की सरकार ने सीएसआइआर के इस प्रबंध के लिये आवास हेतु सौराष्ट्र के किसी भी भवन को देने के लिये उदार प्रस्ताव (ऑफर) किया। कोई भवन उपयुक्त न पाये जाने पर सौराष्ट्र सरकार ने भवन निर्माण का खर्च भी देने का प्रस्ताव दिया बशर्ते कि संस्थान सौराष्ट्र में स्थित हो। सौराष्ट्र सरकार के इस प्रस्ताव पर विशेषकर निर्माण, उत्पादन और आपूर्ति मंत्रालय के प्रस्ताव को ध्यान में रखते हुए सीएसआइआर ने विचार किया कि उक्त संस्थान सौराष्ट्र में ही होना चाहिए।
प्रस्तावित संस्थान के योजना अधिकारी श्री पी एन कात्जू ने सौराष्ट्र के उत्तर तटीय तथा दक्षिण तटीय क्षेत्रों के संभवित स्थलों का प्राथमिक सर्वेक्षण किया और संस्थान के लिये उचित स्थल के रुप में, उच्च शिक्षा में समृद्ध भावनगर को पसंद किया गया।
सौराष्ट्र सरकार ने इस कार्य के लिये सीएसआइआर को भव्य राज होटल और प्रायोगिक सॉल्ट फार्म के लिये दो बंगलॉ तथा 125 एकड़ जमीन भेंट करने का प्रस्ताव दिया। सौराष्ट्र सरकार द्बारा प्रस्तावित सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए सीएसआइआर ने भावनगर में नमक संस्थान के निर्माण का निर्णय लिया।
इस तरह केन्द्रीय नमक अनुसंधान संस्थान (जो अब केन्द्रीय नमक व समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान के नाम से जाना जाता है।) का उद्‌घाटन 10 अप्रैल 1954 को, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री श्री पंडित जवाहरलाल नहेरु के करकमलों से किया गया। प्रथम स्थानिक योजना समिति निम्नलिखित सदस्यों को लेकर गठित हुई।

  • श्री जी सी ओझा, औद्योगिक तथा आपूर्ति मंत्रालय मंत्री, सौराष्ट्र सरकार, राजकोट अध्यक्ष
  • श्री उपेन्द्र जी भटृ, मुख्य इंजीनियर, लोक निर्माण विभाग, सौराष्ट्र सरकार, राजकोट सदस्य
  • डॉ माता प्रसाद, निदेशक, केन्द्रीय नमक अनुसंधान संस्थान, भावनगर सदस्य
  • डी एस आइ आर (पदेन) सदस्य
  • श्री जे जी शाह, समाहर्ता, भावनगर सदस्य
  • श्री पी एन कात्जू, योजना अधिकारी, केन्द्रीय नमक अनुसंधान संस्थान, भावनगर सदस्य सचिव

महानुभावों के वक्तव्य

उद्‌घाटन समारोह में श्री के सी रेड्डी, उत्पादन मंत्री, भारत सरकार, श्री यु एन ढेबर, सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री, डॉ एस एस भटृनागर, महानिदेशक, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद्‌, श्री पी ए नारियेलवाला, सलाहकार, टाटा केमीकल्स, श्री क्रिष्नकुमार सिंहजी, भावनगर स्टेट के पूर्व महाराजा तथा अन्य महानुभाव उपस्थित थे।

Inauguration of CSRI  by Pandid Jawaharlal Nehru Pandit

1954 में केन्द्रीय नमक व समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान का उद्‌घाटन तथा प्रवचन




पंडित जवाहरलाल नहेरु,भारत के प्रधानमंत्री

मैं जानता हूँ कि पिछले चार पाँच वर्ष के दौरान वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान पर विशेष ध्यान देकर हमने विज्ञान की ठोस नींव रखी है जिस पर हम नये भारत की देदीप्यमान इमारत खडी कर सके हैं। मज़बूत नींव के बिना इमारत टीक नहीं सकती। जैसे इमारत की नींव दिखाई नहीं देती पर उस पर बनी इमारत का पूर्ण आधार उसी पर होता है वैसे विज्ञान विकास के लिये हमारे प्रयासों से पैसे के रुप में हमें फल न मिले लेकिन मुझे विश्वास है कि ये सब प्रयास सही दिशा में हैं । दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे हमारा देश समृद्ध होगा। हम यह नहीं चाहते हैं कि देश के एक क्षेत्र के खर्च से दूसरे क्षेत्र का विकास हो। प्रगति के पथ पर कुछ पसंदीदा लोग नहीं, हम सबको साथ साथ चलना है। ये अनुसंधान प्रयोगशालाएं, नवीनतर पहलूओं पर हमारे ध्यान तथा पूरे देश के उत्थान के प्रतीक मात्र हैं। मुझे नहीं लगता कि ये प्रयोगशालाएं सिर्फ अपने क्षेत्र में स्थित अवसरों से क्षेत्र की विशिष्ट समस्याओं का हल ढूंढने पर ध्यान देगी। मैं इन प्रयोगशालाओं को हमारी जन्मभूमि की सेवा में समर्पित विज्ञान के मंदिर के रुप में देखता हूँ।
मैं नहीं चाहता कि इन प्रयोगशालाओं में कोई भी कार्यकर्ता सिर्फ अपनी आजिवीका अर्जित करने के उद्देश्य से ही आये, मैं चाहता हूँ कि हमारे युवा पुरुषों और महिलायें जो यहाँ आये उनमें हमारी समस्याओं के उपाय के लिये कार्य करने का उत्साह हो। वे ही इन संस्थानो को जीवन शक्ति देंगे। उनको यह प्रतीती होनी चाहिये कि विज्ञान की सेवा सच्चे अर्थ में भारतभूमि की सेवा ही नहीं बल्कि विश्व की सेवा है। विज्ञान को कोई सीमाएं नहीं होती।

श्री के सी रेड्डी, उत्पादन मंत्री

वैज्ञानिक ज्ञान या तो मानवता बना सकता है या बिगाड सकता है यह ऐसे ज्ञान के उपयोग पर निर्भर करता है। बेशक इतिहास में कई बार विध्वसंकारी युद्धो में अक्सर इसके विनाशकारी दुरुपयोग से विज्ञान की अवनति हुई है तथा मानवजात का अपूरणीय नुक्सान कर रहे हैं। हाल में कुछ देशॉ के बीच, एटम बोम्ब, हाइड्रोजन बोम्ब और अफवाह है कि नाइट्रोजन बोम्ब जैसे विध्वसंकारी हथियारों के उत्पादन में लगी दौड ने पूरी मानवता को डरावने विकास के नश्वर भय में डाल दिया है। विज्ञान के दुरुपयोग से मानव सभ्यता के अंत का यह जीवंत उदाहरण है। तो दूसरी ओर विज्ञान की प्रगति एवं उसका उपयोग, मानवजात को रोगों, अकाल और गरीबी से मुक्ति दिलाकर, उसके जीवनस्तर को ऊँचे उठाने तथा हमारे वचन तथा कार्य के नैतिक मूल्यों में भी हैं।

श्री यु एन ढेबर, मुख्यमंत्री, सौराष्ट्र

इस देश के पुनःनिर्माण में विज्ञान के अनिवार्य महत्व के बारे में मुझे एक ही शब्द में कहने की अनुमति हो तो सभी विषयों पर आधुनिक ज्ञान, प्रेरक अध्ययन तथा प्रयोगों की नई तकनीक का फल है, हमारे पास जो ज्ञान है वह कई पीढ़ियों से जमा है लेकिन आदमी के आत्मा की महत्वकाक्षां अपने पूर्वजों की विरासत से संतुष्ट नहीं है। वह ओर अधिक ज्ञान तथा प्रकृति के रहस्यों को जानने के लिये उत्सुक है। ज्ञान की यह भूख मानवी के आत्मा की आवश्यकता तथा उसकी शारीरिक आवशक्यताओं जो उसे प्रकृति पर अपना प्रभुत्व जमाने के लिये बाध्य करती है दोनों से प्रेरित होती है। हम आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान के लिये पश्चिम के ऋणी है लेकिन हमने भी इसमे योगदान दिया है और अब इस महान देश में किसी भी प्रकार का बंधन नहीं है, हमें वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में हमारी पूर्ण वृद्धि करनी चाहिए तथा राष्ट्र की उपलब्धियों में हमारा योगदान देना चाहिए।

डॉ एस एस भटृनागर, महानिदेशक, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद्‌
मेरे लिए यह एक खुशी की बात है कि जहाँ कहीं राष्ट्रीय प्रयोगशाला की स्थापना हुई है वहाँ पूरे वैज्ञानिक कार्यो के वातावरण में बेहतर बदलाव आया है। अन्य संस्थानो में भी हमारे उदाहरण का अनुसरण करके अपने वैज्ञनिक कर्मचारियों को बेहतर फर्नीचर, बेहतर उपकरण और बेहतर वेतन प्रदान करते हैं। भावनगर के निवासी तथा इस संस्थान की मुलाकात लेनेवाले इस प्रयोगशाला पर परिषद का असर देख सकेंगें तथा कर्मचारियों के गुण, वैज्ञानिक उपकरणों तथा फर्नीचर की सराहना करेंगें। यह संस्थान श्रेष्ठ बनने का गौरव प्राप्त कर सकेगा।
श्री पी ए नारियेलवाला, सलाहकार, टाटा केमीकल्स लिमिटेड

इस संस्थान की स्थापना के पहले से प्रवर्तमान नमक उद्योग की समस्याओं का इसके द्बारा निराकरण महत्वपूर्ण योगदान होगा। उन समस्याओं में से कुछ हैं - विभिन्न औद्योगिक आवश्यकयता के लिये विभिन्न गुणवत्तावाले नमक का उत्पादन, नमक उद्योग के उपउत्पादों की प्राप्ति के लिये किफायती पद्धतियाँ विकसित करना आदि। चूँ कि नमक का विशेष उत्पादन समुद्री जल से किया जाता है, समुद्र में स्थित क्षारों की प्राप्ति की व्यापक संभावनाएं हैं जैसे पोटाश जिसकी देश में कमी है, ब्रोमीन जिसका रंजक, कीटनाशकों आदि के निर्माण में उपयोग होता है। मेग्नेशियम सॉल्ट जिसमें से हम मेग्नेशियम धातु, मिश्र धातु जिसका एयरक्राफ्ट के निर्माण में उपयोग बढ़ रहा है तथा सल्फर तत्व की प्राप्ति जिसका देश में स्रोत के बारे में हमें जानकारी नहीं है।

डॉ माताप्रसाद

सौराष्ट्र को 700 माइल्स का समुद्रतट है जिस पर कई नमक उत्पादन केन्द्र हैं। मैं सौराष्ट्र के नमक उत्पादनकर्ताओं को इस संस्थान में किये जानेवाले और आगे भी किये जानेवाले अनुसंधान कार्यो में सक्रिय रस लेकर, नये ज्ञान का उपयोग करके, उच्च गुणवत्तावाले नमक तथा उपज़ में वृद्धि हेतु तथा नमक निर्माण के उप उत्पादों का उपयोग करके नये उद्योगों का निर्माण करने के लिये आमंत्रित करता हूँ।

वर्तमान सीएसएमसीआरआई:

संस्थान ने विशेष वैज्ञानिक उत्साह द्वारा कुछ उत्कृष्ट प्रोद्योगिकियाँ तथा संस्थान के मुख्य अधिदेश अंतर्गत कई स्वीकृत पेटन्ट की उपलब्धि हांसिल की है तथा यह संस्थान देश में उत्कृष्ट कार्यप्रदर्शन कर रही अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशालाओं में से एक है। वर्ष 2011 के प्रारंभ में, 150 वैज्ञानिक तथा तकनीकी कर्मचारियों के साथ लगभग 360 कर्मचारी इसके वेतनपत्र पर हैं साथ ही 250 अनुसंधान छात्रों, परियोजना सहायकों उनके डॉक्टरेट कार्यक्रम कर रहे हैं। हाल में, संस्थान द्वारा विकसित निम्नलिखित सीमाचिन्ह रूप प्रौद्योगिकियों ने संस्थान की छवि को बदल दिया है।

  • सांद्रित प्राकृतिक ब्राइन में से अतिशुद्ध मैग्नीशिया, ग्रीन ब्रोमीन तथा सोप उत्पादन  हेतु समाकलित प्रक्रिया
  • ताजा समुद्री शैवाल में से पौधे के लिए पोषकों से समृद्ध सेप तथा अवशेषों से के-केराजिनन के एक साथ उत्पादन के लिए समाकलित प्रक्रिया
  • जेट्रोफा कर्कस से शुध्ध बायोडीजल
  • निम्न अस्वीकृति दर के साथ शुद्ध जल के लिए होलो फाइबर अल्ट्राफिल्ट्रेशन मेम्ब्रेन का विकास
  • नमकीन जल तथा समुद्रीजल में से पेयजल (<500 पीपीएम टीडीएस) की प्राप्ति के लिए टीएफसी आर ओ मेम्ब्रेन
  • प्राकृतिक ब्राइन से अतिशुद्ध नमक का उत्पादन
  • प्राकृतिक ब्राइन में से गोलाकार नमक का उत्पादन
  • बिटर्न में से निम्न सोडियमवाला नमक तथा सेलिकोर्निया में से वनस्पतिजन्य नमक
  • आण्विक जैव विज्ञान तथा जेनेटिक इंजीनियरिंग के माध्यम से नमक सह्यता प्रदान करनेवाले ट्रांसजेनिक कृषि फसलें

इन महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकीय उपलब्धियाँ अच्छी तरह से प्रिंट तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में दर्शायी गई है तथा संस्थान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तर पर उल्लेखनीय रूप से दृश्यमान किया है।

वर्तमान प्रमुख परियोजनाओं में शामिल हैं –

  • एफसीओ ग्रेड के सल्फेट ऑफ पोटाश, अमोनियम सल्फेट तथा अतिशुद्ध मैग्नीशिया के समाकलित उत्पादन के लिए 0.75 टीपीडी पोटाश परीक्षण क्यारी; डीपीए के (डीएसटी) साथ k+ का बड़े पैमाने पर निष्कर्षण का भी प्रावधान है। 
  • समुद्रीशैवाल से जैवइंधन के लिये विविध संस्थानों की NMITLI परियोजना (सीएसआईआर) में सीएसएमसीआरआइ नोडल प्रयोगशाला के रूप में है।
  • विशेष पंजीकृत पौधों से 50,000 जेट्रोफा ऊत्तक संवर्धन की सुविधा का निर्माण (MNRE)
  • जीवन चक्र विश्लेषण के साथ व्यापारिक जेट्रोफा करकस की तकनीकी व्यवहार्यता एवं आर्थिक क्षमता (GM/US DOE)
  • स्वदेशी समुद्री शैवाल से जैव इथेनोल तथा बड़े पैमाने पर उसकी अपतटीय कृषि (MNRE)
  • शैवालीय जैव इंधन पर इयु परियोजना
  • शैवाल पुष्प पर अध्ययन के लिए ISRO-CSMCRI सहयोगी परियोजना
  • अफघानिस्तान (नार्वेजीयन चर्च एड) के लिए 5 आरओ प्लांट तथा 5 सौर ऊर्जा चालित आरओ यूनिट (FORRAD और कोकाकोला फाउंडेशन द्वारा साजेदारी में समर्थित)
  • अतिशुद्ध सौर नमक प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के लिए राजुला में नमक क्लस्टर विकास कार्यक्रम (गुजरात इंडस्ट्रीज कमिशनरेट)
  • कार्बन नैनोट्यूब के उपयोग सहित अपक्षारीकरण पर CSMCRI-CSIRO की सहयोगी परियोजना
  • नई सीएसआईआर सशक्तिकरण परियोजना अंतर्गत 2010 में 13 नई परियोजना मंजूर की गई हैं जिन पर हाल में संस्थान के युवा वैज्ञानिकों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में कार्य किए जा रहे हैं।
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संस्थान के कई वैज्ञानिकों ने अपने क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त की है, प्रतिष्ठित एवोर्डस, फैलोशिप प्राप्त की हैं और कई पत्रिकाओं/जरनलों के संपादकीय बोर्ड में स्थान प्राप्त किया है। वर्ष 2010 में, संस्थान ने लगभग 140 वैज्ञानिक प्रकाशन किया है, और जिनका इम्पैक्ट फेक्टर भी बनाया रखा है। तदुपरांत पुस्तकों का प्रकाशन भी किया है। 2010 के वर्ष में बौद्धिक संपदा में संस्थान ने लगभग 20 अंतरराष्ट्रीय और भारतीय पेटेंट प्राप्त की है।

SCI publications

हाल ही में सीएसएमसीआरआइ को, सीएसआइआर की विभिन्न प्रयोगशालाओं के साथ वैज्ञानिक गतिविधियों, के समन्वय में 14-27 नवम्बर 2010 के दौरान नई दिल्ली में संपन्न टेकनोफेस्ट समारोह में ‘जल’ विषय में स्वर्ण पुरस्कार प्राप्त करने का सोभाग्य मिला है।

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